अपना तो त्योहार तभी, जब मंजूर हो जाये छुट्टी

समझिये, वर्दी के पीछे का दर्द

गोला गोकर्णनाथ खीरी। पुलिस का नाम सुनते ही आन-बान और शान का प्रतीक मानी जाने जाती खाकी वर्दी पहने हाथ में डंडा लिए पुलिसकर्मी को रोबीली तसवीर उभरकर सामने आ जाती है लेकिन यदि इस रोबीली आवाज के पीछे की तस्वीर का दूसरा पहलू देखें तो बयां करने के लिए शब्द शायद कम पड़ जाएं।कड़कड़ाती हुई ठंड हो, गर्मी, बरसात या फिर आंधी तूफान ! कानून, फर्ज व ईमान की बेड़ियों में जकड़े पुलिसकर्मी, जो खतरों से जूझते हुए वीआईपी से लेकर आम नागरिकों की सुरक्षा में मुस्तैदी से तत्पर नजर आते हैं। वही पुलिस के जवान खुद कितने ही खतरों पर खेलकर, अपनी जान की भी परवाह ना करते हुए, असामाजिक तत्वों से राष्ट्रीय व निजी संपत्तियों की 24 घन्टे 365 दिन सुरक्षा करते हैं, तब कहीं जाकर हम अपने देश में आज़ादी से सांस लेते हुए चैन से सो पाते हैं। यदि एक दिन भी पुलिस अपना कार्य करना बंद कर दे, तब चारो तरफ ट्रैफिक जाम की स्थिति उत्पन हो जाएगी,सब अस्त व्यस्त हो जायेगा। अपराधिक प्रवृत्ति के लोग बेटियो, माताओं और बुजुर्गों की खुलेआम बेइज्जती करते नजर आएंगे। जब पुलिस काम ना करे तो अपने घर में भी हम स्वयं को भी असुरक्षित महसूस करेंगे, अपराध का ग्राफ बढ़ जाएगा और अपराधियों के हौसते बुलंद हो जाएंगे।

दिहाड़ी मज़दूरों से भी ज्यादा बदतर स्थिति

विभिन्न श्रम एक्ट और फैक्ट्रीज एक्ट 1947 के अनुसार किसी भी व्यक्ति को पूरे सप्ताह में 48 घंटे और एक दिन में 9 घंटे से ज्यादा काम नहीं करवाया जा सकता है। वहीं पुलिसकर्मी एक दिन में कम से-कम 12 घन्टेऔर सप्ताह में लगभग 84 घंटे कार्य करते हैं और यदि क्षेत्र में कहीं भी दंगा फसाद हो जाए, फिर ड्यूटी कब खत्म होगी? इसका कुछ पता नहीं। सरकार के नियम और हेडक्वार्टर के दिशा निर्देशानुसार पुलिस विभाग के किसी भी अधिकारी या आरक्षी का कहीं भी और कभी भी ट्रांसफर किया जा सकता है। पुलिस हेडक्वार्टर से अचानक मिलने वाले सरकारी आदेश के बाद संबंधित अन्य जनपद के थाना क्षेत्र में तत्काल अपनी इयूटी जॉइन करने के लिए जाना होता है। पुलिसकर्मी अपने माता पिता, जीवन साथी, बच्चों व घर-परिवार से दूर, अनजाने शहर व गाँव में अवश्यकतानुसार आवास ना मिल पाने की वजह से कई-कई दिनों तक अकेले रहते हैं, जिस कारण उन्हें बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सभी को तत्काल सरकारी आवास उपलब्ध कराना विभाग के लिए संभव नहीं हो पाता है और सख्त रवैये के कारण आम आदमी भी पुलिस से खौफ खाता है और अधिक किराया मिलने पर भी मकान देने से डरता है।

क्यों आक्रमक हो जाते हैं पुलिसकर्मी….?

अब सोचने वाली बात यह है कि जब नियमानुसार हर पांच साल बाद जनता द्वारा चुने जाने वाले जनप्रतिनिधियों का भी लक्ष्य सुरक्षा और कानून व्यवस्था बहाल रखते हुए जनता की सेवा करना है, तो अपनी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए विश्व में विशिष्ट पहचान रखने वाली पुलिस के प्रति ऐसे समय में आखिर लोगों का नज़रिया क्यों बदल जाता है?यही नहीं, अक्सर शांत स्वभाव के दिखाई देने वाले पुलिसकर्मी भी इतने आक्रामक क्यों हो जाते हैं? तब चलिए कुछ रोचक जानकारियों के साथ इस लेख के माध्यम से हम खाकी वर्दी के पीछे छुपे हुए उस दर्द को महसूस करने का प्रयास करते हैं।

पुलिस झेलती हैं राजनीतिक दबाव

राजनीतिक प्रेशर के कारण आये दिन पुलिस वालों को आम जनता के क्रोध, अभद्रता व अपशब्दों के साथ-साथ ही गम्भीर आरोपों का भी सामना करना पड़ता है। ड्यूटी के दौरान शायद ही कोई ऐसा पुलिसकर्मी बचा हो, जिसे मोटा, गैंडा, ठुल्लू आदि अलंकारों से विभूषित न किया गया हो।पुलिस की वर्दी पहनने के बाद किसी भी पुलिसकर्मी का शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो, जब उसे आम आदमी, मीडिया व उच्चाधिकारियों से लेकर छुटभैया या कद्दावर नेताओं द्वारा खरी-खोटी सुनाते हुए जलील ना किया जाता हो। इतना सब कुछ होने के बाद भी पुलिस धैर्य बनाये रखती है, जिसकी वजह से वे हमेशा मानसिक तनाव में रहते हैं और कभी-कभी तनावग्रस्त होने के कारण पुलिसकर्मी अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं और स्थिति विस्फोटक हो जाती है। इतना सब कुछ सहने के बाद भी अपने फर्ज़ व ड्यूटी को जिम्मेदारी के साथ अंजाम देने का प्रयास करने वाले ऐसे वतन के रखवाले सिपाहियों को हम सलाम करते हैं।

निजी समस्याओं को नज़र-अंदाज़ कर, देते हैं फर्ज़ को अंजाम

जनपद में कर्फ्यू का महौल हो, किसी वीआई पी की सुरक्षा का मामला, मेले का आयोजन या फिर प्रतिदिन विभिन्न क्षेत्र में दिन-रात की गश्त हो अथवा ड्यूटी, लगभग सभी स्थानों पर मूलभूत सुविधाओं के अभाव में शुद्ध पेयजल, टोयलेट व गश्त के दौरान मार्ग में बिजली जैसी समस्याओं से दो चार होना पुलिस कर्मियों के लिए अब आम बात हो चुकी है। ड्यूटी के दौरान सबसे ज्यादा परेशानियों का सामना उन महिलाओं को करना पड़ता है, जो कुछ माह पहले ही मां बनी है। ऐसी महिलाओं में भी ड्यूटी पर जाने वाली उन महिलाओं की ड्यूटी और कठिन है, जिनकी स्वयं की तैनाती व पति की सर्विस अपने परिवार से दूर अन्य जनपदों में हैं।पूरी तरह से आश्रित होने के कारण छोटा सा अबोध बच्चा अपनी माँ के पास है और तमाम कोशिशों के बाद भी उसका तबादला गृह जनपद या उसके आसपास मंजूर नहीं हो पा रहा है। छोटे बच्चों की देखरेख के लिए आसपास के क्षेत्र में कहीं भी ‘क्रेच’ की व्यवस्था नहीं है, जहां वे अपने नन्हे बाल गोपाल को छोड़कर ड्यूटी के लिए जा सकें।

खाकी पर भ्रष्टाचार का बदनुमा दाग लगाता सिस्टम

लोकतांत्रिक देश में कानून व्यवस्था चाक-चौबंद बनाए रखने के लिए जिम्मेदार पुलिस पर हमेशा सफेद पोश दिखाई देने वाले जनप्रतिनिधियों, नियम कानून, सिस्टम और सिफारिशों का पूरा दबाव बना रहता है, जिसे अनदेखा करने पर पुलिस कर्मियों को भारी कीमत चुकानी पड़ती है। कभी-कभी जान से भी हाथ धोना पड़ता है, जिसके कारण स्वतंत्र रूप से और पूरी ईमानदारी के साथ कार्य कर पाना खाकी धारियों के लिए संभव नहीं हो पाता है। ज्यादातर ईमानदार पुलिस कर्मियों को निर्धारित समय से पहले ही, आए दिन ट्रांसफर प्रक्रिया के दौर से गुजरना पड़ता है। खाकी वर्दी को दागदार और बदनाम करने वाले कोई और नहीं, बल्कि राजनीतिक संरक्षण प्राप्त सभ्य समाज के कुछ स्वार्थी तत्व होते हैं, जो निजी स्वार्थ सिद्धि के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं। कहना गलत नहीं होगा कि सिस्टम और राजनीतिक प्रेशर के कारण ही खाकी हमेशा जनता के निशाने पर रहती है, जिसका जीता-जागता एक उदाहरण दिसम्बर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर शुरू हुई हिंसक प्रदर्शन के दौरान पूरे भारतवर्ष में दिखाई दिया।जहां, सिर्फ खाकी को ही चुन-चुनकर निशाना बनाया गया, जिसमें कानून व्यवस्था बनाए रखने के प्रयास में बहुत से पुलिसकर्मी घायल हुए और कई बेमौत मारे भी गए। वहीं, वैश्विक महामारी कोविड-19 के दौरान भी अपने प्राणों की परवाह ना करते हुए पुलिस कर्मियों ने अहम भूमिका निभाई, जो कोरोना वॉरियर्स के रूप में आज भी स्मरणीय है।

तनाव का एक कारण है अवकाश ना मिलना

पुलिस विभाग के किसी भी सिपाही की बिना किसी अवकाश के ड्यूटी कम-से-कम 12 घंटे व सैलरी अन्य सरकारी विभागों में कार्यरत कर्मचारियों जितनी ही होती है। लेकिन बात करें निर्धारित निर्धारित की गई छुट्टियों की तो 52 रविवार, 12 द्वितीय शनिवार तथा 36 सरकारी छुट्टियां यानि कि कुल मिलाकर लगभग 100 दिन का अवकाश अन्य विभागीय कर्मचारियों की तरह पुलिस कर्मियों के नसीब में नहीं होता है।कभी-कभी कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए नियमानुसार प्रार्थना पत्र देकर मांगी गई छुट्टियां भी निरस्त कर दी जाती है, जिसकी वजह से हमेशा पुलिस कर्मियों में मानसिक तनाव की स्थिति बनी रहती है।

एपीएस न्यूज से ब्यूरो चीफ अनुराग पटेल के साथ विशेष संवाददाता रफी अहमद की रिपोर्ट…..

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